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Sunday, June 18, 2017

Father's Day की मुबारकबाद
ये रचना पूरी पढ़ने की गुज़ारिश है।
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वो थोड़ा सख्त सा दिखता है जिसको बाप कहते हैं।
इसी पत्थर के सीने से कई झरने भी बहते हैं
।।

हो रुत कोई भी इस गुलशन में पतझड़ ही नहीं आता
थका हारा हो जितना भी उदासी घर नहीं लाता
मुक़द्दर से यूं दो-दो हाथ उसके होते रहते हैं
इसी पत्थर के सीने से.....

मुसीबत हार जाती है उस इक इंसान के आगे
चटानों सा अडिग रहता है हर तूफान के आगे
परेशानी के सारे चक्रव्यूह टूटे से रहते हैं
इसी पत्थर के सीने से....

वो घर की हर ज़रूरत को किसी भी दाम पर लाया
कभी उसने नहीं सोचा न हमको ये ख़्याल आया
ख़ुद उसके अपने अरमानों के कितने महल ढहते हैं
इसी पत्थर के सीने से.....

हर इक मझधार से कश्ती किनारे तक वही लाया
हमें तो आज तक शाहिद समझ में ये नहीं आया
वो सहता है थपेड़े या थपेड़े उसको सहते हैं।
इसी पत्थर के सीने से...कई झरने भी बहते हैं
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शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Thursday, May 5, 2016

पत्थर भी घायल निकलेगा

एक ग़ज़ल
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हर मसअले का हल निकलेगा
आज नहीं तो कल निकलेगा
उसकी रज़ा शामिल हो जिसमें
उस ठोकर से जल निकलेगा
दुःख की गठरी खोल के देखो
कोई ख़ुशी का पल निकलेगा
दीवानों से पूछ के देखो
अहले-ख़िरद पागल निकलेगा
शीशे को तोड़ा है उसने
पत्थर भी घायल निकलेगा
तूने क्या सोचा था शाहिद
जल गई रस्सी बल निकलेगा
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शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Sunday, February 22, 2015

...अच्छा कहना भूल गया

हाज़िर है एक ग़ज़ल-

सारी वफ़ाएं सारी जफ़ाएं जाने क्या-क्या भूल गया
तुम छेड़ो तो याद आ जाए मैं तो किस्सा भूल गया

साथी मुझको लेकर चलना फिर बचपन की गलियों में
शायद ऐसा कुछ मिल जाए जिसको लाना भूल गया

हां मैं ऊंचा बोला था तस्लीम किया मैंने लेकिन
मेरी बातें याद रहीं खुद अपना लहजा भूल गया

अपना हर सामान समेटा लेकिन जल्दी-जल्दी में
मेरी आंखों में वो नादां अपना चेहरा भूल गया

तुम क्या रूठे लफ़्ज़ भी अब तो मुझसे रूठ गए शाहिद
सुनने वाले ये कहते हैं अच्छा कहना भूल गया

                             शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Monday, November 10, 2014

चुप रहा था मैं


कहीं सब कुछ न हो जाए उजागर चुप रहा था मैं
तुम्हारे दिल की चौखट तक भी आकर चुप रहा था मैं

अब ऊंचा बोलने का तुम मुझे इल्जाम मत देना
तुम्हारे नर्म लहजे तक बराबर चुप रहा था मैं।

मेरी सीधी सी बातों के कई मतलब न वो समझें
बहुत कुछ कहने की हसरत तो थी पर चुप रहा था मैं

ये आसां भी था मुमकिन भी मुनासिब भी जरूरी भी
बदलते देख तुमको, खुद बदलकर चुप रहा था मैं

सदा दिल की वो सुन लें बस इसी उम्मीद में शाहिद
बहुत हौले से इक दर खटखटाकर चुप रहा था मैं।

शाहिद मिर्जा शाहिद


Thursday, October 2, 2014

सम्मानित जनो,
आज ही दिन पांच साल पहले ब्लागिंग शुरू की थी। इन पांच सालों में कितना अंतर आ गया है। आज ब्लागिंग के बजाय फेसबुक की ओर लोगों का अधिक रुझान रहने लगा है।
खैर... आज गांधी जयंती पर एक पुराना कताअ पेश है-

अहिंसा के मसायल पर रजा अपनी भी रखते हैं।
कोई बुजदिल समझ बैठे दवा इसकी भी रखते हैं।
हमारे सब्र की इक हद है इसको पार मत करना
हैं गांधी भी, मगर हम हाथ में लाठी भी रखते हैं।
                     -शाहिद मिर्जा शाहिद