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Monday, April 7, 2014

तारे गिनता रहा आसमां देर तक

साहेबान बहुत दिनों बाद आज एक ग़ज़ल हाज़िर है
















नज़रें करती रहीं कुछ बयां देर तक
हम भी पढ़ते रहे सुर्खियां देर तक
आओ उल्फ़त की ऐसी कहानी लिखें
ज़िक्र करता रहे ये जहां देर तक
बज़्म ने लब तो खुलने की मोहलत न दी
एक खमोशी रही दरमियां देर तक
मैं तो करके सवाल अपना खामोश था
तारे गिनता रहा आसमां देर तक
देखकर चाक दामन रफ़ूगर सभी
बस उड़ाते रहे धज्जियां देर तक
कुछ तो तारीकियां ले गईं हौसले
कुछ डराती रहीं आंधियां देर तक
वो बहारों का मौसम बदल ही गया
देखें ठहरेंगी कैसे खिज़ां देर तक
कोई शाहिद ये दरिया से पूछे ज़रा
क्यों तड़पती रहीं मछलियां देर तक
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

4 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन उपलब्धि और आलोचना - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

इस्मत ज़ैदी said...

कुछ तो तारीकियां ले गईं हौसले
कुछ डराती रहीं आंधियां देर तक

बज़्म ने लब तो खुलने की मोहलत न दी
एक खमोशी रही दरमियां देर तक

बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है बिलख़ुसूस ये अश’आर

शारदा अरोरा said...

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल....बहुत दिनों के बाद आपने लिखा ?

आशा जोगळेकर said...

Wah! behad asardar ghazal.